Sumitranandan Pant Birth Anniversary: सुमित्रानंदन पंत की प्रमुख रचनाएं कौन सी हैं? इसलिए कहा जाता था ‘प्रकृति के सुकुमार’



जब भी हिंदी कविता की बात होती है, तो कुछ नाम ऐसे होते हैं जो हमेशा याद आते हैं। उनमें से एक बड़ा नाम है सुमित्रानंदन पंत जी का। हिंदी के छायावादी दौर के चार मजबूत स्तंभों में उनका नाम बड़े गर्व से लिया जाता है — प्रसाद, निराला, महादेवी और पंत। इन चारों ने मिलकर हिंदी कविता को नए रंग दिए, नई सोच दी। लेकिन पंत जी को खास बनाता है उनका प्रकृति से बेहद गहरा रिश्ता।

जीवन परिचय :

पंत जी का जन्म 20 मई 1900 को उत्तराखंड के खूबसूरत गाँव कौसानी में हुआ था। दुख की बात ये रही कि उनके जन्म के कुछ ही घंटों बाद उनकी माँ का निधन हो गया। ऐसे में उनका पालन-पोषण उनकी दादी और पिता ने किया। हिमालय की वादियाँ, हरे-भरे जंगल, बहती नदियाँ — यही उनकी असली पाठशाला थीं। बचपन से ही वो प्रकृति से इतना जुड़ गए थे कि वो हर पेड़, हर बादल, हर फूल को महसूस करते थे और बाद में यही सब उनकी कविताओं में झलकता भी है।

उन्होंने अल्मोड़ा, वाराणसी और इलाहाबाद में पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही उन्हें कविता लिखने का शौक लगा। शुरू में उनकी कविताओं में प्रकृति, प्रेम, और कल्पनाओं की दुनिया नजर आती थी। उनकी किताबें जैसे ‘पल्लव’, ‘गुंजन’ और ‘वेणु’ इसी दौर की हैं।

उनकी प्रमुख रचनाएँ : 



दर्शन और विचार : 

समय के साथ उनकी कविता में भी बदलाव आया। अब वो सिर्फ फूल-पत्तियों की बातें नहीं करते, बल्कि समाज की सच्चाई, इंसानी परेशानियाँ और बदलाव की ज़रूरतों को भी अपनी कविताओं में लाने लगे। ‘ग्राम्या’, ‘चिदंबरा’ जैसी रचनाओं में यही सोच देखने को मिलती है।


व्यक्तित्व और प्रभाव :

पंत जी पर गांधीजी, अरविंदो और मार्क्स जैसे बड़े विचारकों का असर था। वो मानते थे कि कविता सिर्फ सुंदर लगने के लिए नहीं होती, बल्कि सोचने और बदलने के लिए होती है।


भाषा शैली :

उनकी भाषा बहुत कोमल, भावुक और मीठी होती थी। पढ़ते वक्त लगता है जैसे कोई कविता नहीं, कोई धुन सुन रहे हों। उन्होंने संस्कृत के शब्दों को बड़े प्यार से इस्तेमाल किया और एक खास तरह की लय उनकी रचनाओं में होती थी।

पुरस्कार और सम्मान :

उनके शानदार काम के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले —

पद्मभूषण (1958)

साहित्य अकादमी पुरस्कार (1960)

ज्ञानपीठ पुरस्कार (1968)



निधन :

पंत जी का निधन 28 दिसंबर 1977 को हुआ। आज भी उनके पैतृक गाँव कौसानी में उनका घर संग्रहालय में बदला जा चुका है, जहाँ उनके हाथ से लिखे पन्ने और निजी चीजें संभाल कर रखी गई हैं।

आज के समय में, जब भाषा में भावनाएँ कम हो रही हैं, पंत जी की कविताएँ हमें रुक कर महसूस करना सिखाती हैं। उनकी रचनाएँ सिर्फ पन्नों पर नहीं, दिलों में जिंदा रहती हैं।

उनकी जयंती पर हम उन्हें दिल से याद करते हैं और सलाम करते हैं उस कवि को, जिसने हमें शब्दों से प्रेम करना सिखाया।

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